॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.70.6
अथाप्लुतोऽम्भस्यमले यथाविधि
क्रियाकलापं परिधाय वाससी।
चकार सन्ध्योपगमादि सत्तमो
हुतानलो ब्रह्म जजाप वाग्यतः॥ ६
athāpluto'mbhasyamale yathāvidhi
kriyākalāpaṃ paridhāya vāsasī|
cakāra sandhyopagamādi sattamo
hutānalo brahma jajāpa vāgyataḥ|| 6
अर्थ
इसके बाद वे विधिपूर्वक निर्मल और पवित्र जलमें स्नान करते। फिर शुद्ध धोती पहनकर, दुपट्टा ओढ़कर यथाविधि नित्यकर्म सन्ध्या-वन्दन आदि करते। इसके बाद हवन करते और मौन होकर गायत्रीका जप करते। क्यों न हो, वे सत्पुरुषोंके पात्र आदर्श जो हैं॥ ६॥