भगवान् श्रीकृष्णको देखकर राजा युधिष्ठिरका हृदय स्नेहातिरेकसे गद्गद हो गया। उन्हें बहुत दिनोंपर अपने प्रियतम भगवान् श्रीकृष्णको देखनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था। अतः वे उन्हें बार-बार अपने हृदयसे लगाने लगे॥ २५॥
दृष्ट्वा विक्लिन्नहृदयः कृष्णं स्नेहेन पाण्डवः।
चिराद् दृष्टं प्रियतमं सस्वजेऽथ पुनः पुनः॥ २५
भगवान् श्रीकृष्णको देखकर राजा युधिष्ठिरका हृदय स्नेहातिरेकसे गद्गद हो गया। उन्हें बहुत दिनोंपर अपने प्रियतम भगवान् श्रीकृष्णको देखनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था। अतः वे उन्हें बार-बार अपने हृदयसे लगाने लगे॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.71.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 577) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/71/25/