श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

उद्दीप्तदीपबलिभिः प्रतिसद्मजाल-

निर्यातधूपरुचिरं विलसत्पताकम्।

मूर्धन्यहेमकलशै रजतोरुशृङ्गै-

र्जुष्टं ददर्श भवनैः कुरुराजधाम॥ ३३

uddīptadīpabalibhiḥ pratisadmajāla-

niryātadhūparuciraṃ vilasatpatākam|

mūrdhanyahemakalaśai rajatoruśṛṅgai-

rjuṣṭaṃ dadarśa bhavanaiḥ kururājadhāma|| 33

अर्थ

घर-घरमें ठौर-ठौरपर दीपक जलाये गये थे, जिनसे दीपावलीकी-सी छटा हो रही थी। प्रत्येक घरके झरोखोंसे धूपका धूआँ निकलता हुआ बहुत ही भला मालूम होता था। सभी घरोंके ऊपर पताकाएँ फहरा रही थीं तथा सोनेके कलश और चाँदीके शिखर जगमगा रहे थे। भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकारके महलोंसे परिपूर्ण पाण्डवोंकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ नगरको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ ३३॥✎ 2130

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2130 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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