॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.71.9
गायन्ति ते विशदकर्म गृहेषु देव्यो
राज्ञां स्वशत्रुवधमात्मविमोक्षणं च।
गोप्यश्च कुंजरपतेर्जनकात्मजायाः
पित्रोश्च लब्धशरणा मुनयो वयं च॥ ९
gāyanti te viśadakarma gṛheṣu devyo
rājñāṃ svaśatruvadhamātmavimokṣaṇaṃ ca|
gopyaśca kuṃjarapaterjanakātmajāyāḥ
pitrośca labdhaśaraṇā munayo vayaṃ ca|| 9
अर्थ
जब इस प्रकार आप जरासन्धका वध कर डालेंगे, तब कैदमें पड़े हुए राजाओंकी रानियाँ अपने महलोंमें आपकी इस विशुद्ध लीलाका गान करेंगी कि आपने उनके शत्रुका नाश कर दिया और उनके प्राणपतियोंको छुड़ा दिया। ठीक वैसे ही, जैसे गोपियाँ शंखचूड़से छुड़ानेकी लीलाका, आपके शरणागत मुनिगण गजेन्द्र और जानकीजीके उद्धारकी लीलाका तथा हमलोग आपके माता-पिताको कंसके कारागारसे छुड़ानेकी लीलाका गान करते हैं॥ ९॥