श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

हरिश्‍चन्द्रो रन्तिदेव उञ्छवृत्तिः शिबिर्बलिः।

व्याधः कपोतो बहवो ह्यध्रुवेण ध्रुवं गताः॥ २१

hariścandro rantideva uñchavṛttiḥ śibirbaliḥ|

vyādhaḥ kapoto bahavo hyadhruveṇa dhruvaṃ gatāḥ|| 21

अर्थ

राजन्! आप तो जानते ही होंगे—राजा हरिश्‍चन्द्र, रन्तिदेव, केवल अन्‍नके दाने बीन-चुनकर निर्वाह करनेवाले महात्मा मुद्गल, शिबि, बलि, व्याध और कपोत आदि बहुत-से व्यक्ति अतिथिको अपना सर्वस्व देकर इस नाशवान् शरीरके द्वारा अविनाशी पदको प्राप्त हो चुके हैं। इसलिये आप भी हमलोगोंको निराश मत कीजिये॥ २१॥

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