श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

युधिष्ठिर उवाच

क्रतुराजेन गोविन्द राजसूयेन पावनीः।

यक्ष्ये विभूतीर्भवतस्तत् सम्पादय नः प्रभो॥ ३

kraturājena govinda rājasūyena pāvanīḥ|

yakṣye vibhūtīrbhavatastat sampādaya naḥ prabho|| 3

अर्थ

धर्मराज युधिष्ठिरने कहा—गोविन्द! मैं सर्वश्रेष्ठ राजसूय-यज्ञके द्वारा आपका और आपके परम पावन विभूतिस्वरूप देवताओंका यजन करना चाहता हूँ। प्रभो! आप कृपा करके मेरा यह संकल्प पूरा कीजिये॥ ३॥

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