श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

न ब्रह्मणः स्वपरभेदमतिस्तव स्यात्

सर्वात्मनः समदृशः स्वसुखानुभूतेः।

संसेवतां सुरतरोरिव ते प्रसादः

सेवानुरूपमुदयो न विपर्ययोऽत्र॥ ६

na brahmaṇaḥ svaparabhedamatistava syāt

sarvātmanaḥ samadṛśaḥ svasukhānubhūteḥ|

saṃsevatāṃ surataroriva te prasādaḥ

sevānurūpamudayo na viparyayo'tra|| 6

अर्थ

प्रभो! आप सबके आत्मा, समदर्शी और स्वयं आत्मानन्दके साक्षात्कार हैं, स्वयं ब्रह्म हैं। आपमें ‘यह मैं हूँ और यह दूसरा, यह अपना है और यह पराया’—इस प्रकारका भेदभाव नहीं है। फिर भी जो आपकी सेवा करते हैं, उन्हें उनकी भावनाके अनुसार फल मिलता ही है—ठीक वैसे ही, जैसे कल्पवृक्षकी सेवा करनेवालेको। उस फलमें जो न्यूनाधिकता होती है वह तो न्यूनाधिक सेवाके अनुरूप ही होती है। इससे आपमें विषमता या निर्दयता आदि दोष नहीं आते॥ ६॥

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