जैसे मूर्खलोग मृगतृष्णाके जलको ही जलाशय मान लेते हैं, वैसे ही इन्द्रियलोलुप और अज्ञानी पुरुष भी इस परिवर्तनशील मायाको सत्य वस्तु मान लेते हैं॥ ११॥✎ 1709
मृगतृष्णां यथा बाला मन्यन्त उदकाशयम्।
एवं वैकारिकीं मायामयुक्ता वस्तु चक्षते॥ ११
जैसे मूर्खलोग मृगतृष्णाके जलको ही जलाशय मान लेते हैं, वैसे ही इन्द्रियलोलुप और अज्ञानी पुरुष भी इस परिवर्तनशील मायाको सत्य वस्तु मान लेते हैं॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 588) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/73/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)