श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.73.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 73 · अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

गत्वा ते खाण्डवप्रस्थं शंखान् दध्मुर्जितारयः।

हर्षयन्तः स्वसुहृदो दुर्हृदां चासुखावहाः॥ ३२

gatvā te khāṇḍavaprasthaṃ śaṃkhān dadhmurjitārayaḥ|

harṣayantaḥ svasuhṛdo durhṛdāṃ cāsukhāvahāḥ|| 32

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण भीमसेनके द्वारा जरासन्धका वध करवाकर भीमसेन और अर्जुनके साथ जरासन्धनन्दन सहदेवसे सम्मानित होकर इन्द्रप्रस्थके लिये चले। उन विजयी वीरोंने इन्द्रप्रस्थके पास पहुँचकर अपने-अपने शंख बजाये, जिससे उनके इष्टमित्रोंको सुख और शत्रुओंको बड़ा दुःख हुआ॥ ३१-३२॥✎ 1711

यह अर्थ श्लोक 31–32 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1711 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इन्द्र-प्रस्थके → इन्द्रप्रस्थके

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