धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके इस परम अनुग्रहकी बात सुनकर प्रेमसे भर गये, उनके नेत्रोंसे आनन्दके आँसुओंकी बूँदें टपकने लगीं और वे उनसे कुछ भी कह न सके॥ ३५॥
निशम्य धर्मराजस्तत् केशवेनानुकम्पितम्।
आनन्दाश्रुकलां मुंचन् प्रेम्णा नोवाच किंचन॥ ३५
धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके इस परम अनुग्रहकी बात सुनकर प्रेमसे भर गये, उनके नेत्रोंसे आनन्दके आँसुओंकी बूँदें टपकने लगीं और वे उनसे कुछ भी कह न सके॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 591) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/73/35/