श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

सदस्याग्र्यार्हणार्हं वै विमृशन्तः सभासदः।

नाध्यगच्छन्‍ननैकान्त्यात् सहदेवस्तदाब्रवीत्॥ १८

sadasyāgryārhaṇārhaṃ vai vimṛśantaḥ sabhāsadaḥ|

nādhyagacchannanaikāntyāt sahadevastadābravīt|| 18

अर्थ

अब सभासद् लोग इस विषयपर विचार करने लगे कि सदस्योंमें सबसे पहले किसकी पूजा—अग्रपूजा होनी चाहिये। जितनी मति, उतने मत। इसलिये सर्वसम्मतिसे कोई निर्णय न हो सका। ऐसी स्थितिमें सहदेवने कहा—॥ १८॥

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