श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

वासोभिः पीतकौशेयैर्भूषणैश्‍च महाधनैः।

अर्हयित्वाश्रुपूर्णाक्षो नाशकत् समवेक्षितुम्॥ २८

vāsobhiḥ pītakauśeyairbhūṣaṇaiśca mahādhanaiḥ|

arhayitvāśrupūrṇākṣo nāśakat samavekṣitum|| 28

अर्थ

उन्होंने भगवान्‌को पीले-पीले रेशमी वस्त्र और बहुमूल्य आभूषण समर्पित किये। उस समय उनके नेत्र प्रेम और आनन्दके आँसुओंसे इस प्रकार भर गये कि वे भगवान्‌को भलीभाँति देख भी नहीं सकते थे॥ २८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें