vṛddhānāmapi yad buddhirbālavākyairvibhidyate|| 31
अर्थ
‘सभासदो! श्रुतियोंका यह कहना सर्वथा सत्य है कि काल ही ईश्वर है। लाख चेष्टा करनेपर भी वह अपना काम करा ही लेता है—इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने देख लिया कि यहाँ बच्चों और मूर्खोंकी बातसे बड़े-बड़े वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्धोंकी बुद्धि भी चकरा गयी है॥ ३१॥
ईशो दुरत्ययः काल इति सत्यवती श्रुतिः।
वृद्धानामपि यद् बुद्धिर्बालवाक्यैर्विभिद्यते॥ ३१
‘सभासदो! श्रुतियोंका यह कहना सर्वथा सत्य है कि काल ही ईश्वर है। लाख चेष्टा करनेपर भी वह अपना काम करा ही लेता है—इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने देख लिया कि यहाँ बच्चों और मूर्खोंकी बातसे बड़े-बड़े वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्धोंकी बुद्धि भी चकरा गयी है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 594) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/74/31/