श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

ययातिनैषां हि कुलं शप्तं सद्भिर्बहिष्कृतम्।

वृथापानरतं शश्‍वत् सपर्यां कथमर्हति॥ ३६

yayātinaiṣāṃ hi kulaṃ śaptaṃ sadbhirbahiṣkṛtam|

vṛthāpānarataṃ śaśvat saparyāṃ kathamarhati|| 36

अर्थ

आपलोग जानते हैं कि राजा ययातिने इसके वंशको शाप दे रखा है। इसलिये सत्पुरुषोंने इस वंशका ही बहिष्कार कर दिया है। ये सब सर्वदा व्यर्थ मधुपानमें आसक्त रहते हैं। फिर ये अग्रपूजाके योग्य कैसे हो सकते हैं?॥ ३६॥

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