परन्तु शिशुपालको इससे कोई घबड़ाहट न हुई। उसने बिना किसी प्रकारका आगा-पीछा सोचे अपनी ढाल-तलवार उठा ली और वह भरी सभामें श्रीकृष्णके पक्षपाती राजाओंको ललकारने लगा॥ ४२॥
ततश्चैद्यस्त्वसम्भ्रान्तो जगृहे खड्गचर्मणी।
भर्त्सयन् कृष्णपक्षीयान् राज्ञः सदसि भारत॥ ४२
परन्तु शिशुपालको इससे कोई घबड़ाहट न हुई। उसने बिना किसी प्रकारका आगा-पीछा सोचे अपनी ढाल-तलवार उठा ली और वह भरी सभामें श्रीकृष्णके पक्षपाती राजाओंको ललकारने लगा॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 595) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/74/42/