श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

स्वलंकृता नरा नार्यो गन्धस्रग्भूषणाम्बरैः।

विलिम्पन्त्योऽभिषिंचन्त्यो विजह्रुर्विविधै रसैः॥ १४✎ 1187

svalaṃkṛtā narā nāryo gandhasragbhūṣaṇāmbaraiḥ|

vilimpantyo'bhiṣiṃcantyo vijahrurvividhai rasaiḥ|| 14

अर्थ

इन्द्रप्रस्थके नर-नारी इत्र-फुलेल, पुष्पोंके हार, रंग-बिरंगे वस्त्र और बहुमूल्य आभूषणोंसे सज-धजकर एक-दूसरेपर जल, तेल, दूध, मक्खन आदि रस डालकर भिगो देते, एक-दूसरेके शरीरमें लगा देते और इस प्रकार क्रीडा करते हुए चलने लगे॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1187 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विजहृर्विविधै → विजह्रुर्विविधै

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