॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.75.35
आसीनः कांचने साक्षादासने मघवानिव।
पारमेष्ठ्यश्रिया जुष्टः स्तूयमानश्च वन्दिभिः॥ ३५
āsīnaḥ kāṃcane sākṣādāsane maghavāniva|
pārameṣṭhyaśriyā juṣṭaḥ stūyamānaśca vandibhiḥ|| 35
अर्थ
एक दिन राजाधिराज महाराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, सम्बन्धियों एवं अपने नयनोंके तारे परम हितैषी भगवान् श्रीकृष्णके साथ मयदानवकी बनायी सभामें स्वर्णसिंहासनपर देवराज इन्द्रके समान विराजमान थे। उनकी भोग-सामग्री, उनकी राज्यलक्ष्मी ब्रह्माजीके ऐश्वर्यके समान थी। वंदीजन उनकी स्तुति कर रहे थे॥ ३४-३५॥