श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

गुरुशुश्रूषणे जिष्णुः कृष्णः पादावनेजने।

परिवेषणे द्रुपदजा कर्णो दाने महामनाः॥ ५

guruśuśrūṣaṇe jiṣṇuḥ kṛṣṇaḥ pādāvanejane|

pariveṣaṇe drupadajā karṇo dāne mahāmanāḥ|| 5

अर्थ

अर्जुन गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषा करते थे और स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण आये हुए अतिथियोंके पाँव पखारनेका काम करते थे। देवी द्रौपदी भोजन परसनेका काम करतीं और उदारशिरोमणि कर्ण खुले हाथों दान दिया करते थे॥ ५॥✎ 1713

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1713 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: उदार-शिरोमणि → उदारशिरोमणि

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