श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.76.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 76 · अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः

इति मूढः प्रतिज्ञाय देवं पशुपतिं प्रभुम्।

आराधयामास नृप पांसुमुष्टिं सकृद् ग्रसन्॥ ४

iti mūḍhaḥ pratijñāya devaṃ paśupatiṃ prabhum|

ārādhayāmāsa nṛpa pāṃsumuṣṭiṃ sakṛd grasan|| 4

अर्थ

परीक्षित्! मूढ़ शाल्वने इस प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधिदेव भगवान् पशुपतिकी आराधना प्रारम्भ की। वह उन दिनों दिनमें केवल एक बार मुट्ठीभर राख फाँक लिया करता था॥ ४॥

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