॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.77.14
तं च षोडशभिर्विद्ध्वा बाणैः सौभं च खे भ्रमत्।
अविध्यच्छरसन्दोहैः खं सूर्य इव रश्मिभिः॥ १४
taṃ ca ṣoḍaśabhirviddhvā bāṇaiḥ saubhaṃ ca khe bhramat|
avidhyaccharasandohaiḥ khaṃ sūrya iva raśmibhiḥ|| 14
अर्थ
इसके बाद उन्होंने शाल्वको सोलह बाण मारे और उसके विमानको भी, जो आकाशमें घूम रहा था, असंख्य बाणोंसे चलनी कर दिया—ठीक वैसे ही, जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे आकाशको भर देता है॥ १४॥