श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.77.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 77 · अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

यत्पादसेवोर्जितयाऽऽत्मविद्यया

हिन्वन्त्यनाद्यात्मविपर्ययग्रहम् ।

लभन्त आत्मीयमनन्तमैश्‍वरं

कुतो नु मोहः परमस्य सद्गतेः॥ ३२

yatpādasevorjitayā''tmavidyayā

hinvantyanādyātmaviparyayagraham |

labhanta ātmīyamanantamaiśvaraṃ

kuto nu mohaḥ paramasya sadgateḥ|| 32

अर्थ

बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा करके आत्मविद्याका भलीभाँति सम्पादन करते हैं और उसके द्वारा शरीर आदिमें आत्मबुद्धिरूप अनादि अज्ञानको मिटा डालते हैं तथा आत्मसम्बन्धी अनन्त ऐश्‍वर्य प्राप्त करते हैं। उन संतोंके परम गतिस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णमें भला, मोह कैसे हो सकता है?॥ ३२॥

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