परीक्षित्! जब पापी शाल्व मर गया और उसका विमान भी गदाके प्रहारसे चूर-चूर हो गया, तब देवतालोग आकाशमें दुन्दुभियाँ बजाने लगे। ठीक इसी समय दन्तवक्त्र अपने मित्र शिशुपाल आदिका बदला लेनेके लिये अत्यन्त क्रोधित होकर आ पहुँचा॥ ३७॥
तस्मिन् निपतिते पापे सौभे च गदया हते।
नेदुर्दुन्दुभयो राजन् दिवि देवगणेरिताः।
सखीनामपचितिं कुर्वन् दन्तवक्त्रो रुषाभ्यगात्॥ ३७
परीक्षित्! जब पापी शाल्व मर गया और उसका विमान भी गदाके प्रहारसे चूर-चूर हो गया, तब देवतालोग आकाशमें दुन्दुभियाँ बजाने लगे। ठीक इसी समय दन्तवक्त्र अपने मित्र शिशुपाल आदिका बदला लेनेके लिये अत्यन्त क्रोधित होकर आ पहुँचा॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 610) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/37/