॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.78.2
एकः पदातिः संक्रुद्धो गदापाणिः प्रकम्पयन्।
पद्भ्यामिमां महाराज महासत्त्वो व्यदृश्यत॥ २
ekaḥ padātiḥ saṃkruddho gadāpāṇiḥ prakampayan|
padbhyāmimāṃ mahārāja mahāsattvo vyadṛśyata|| 2
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रकके मारे जानेपर उनकी मित्रताका ऋण चुकानेके लिये मूर्ख दन्तवक्त्र अकेला ही पैदल युद्धभूमिमें आ धमका। वह क्रोधके मारे आग-बबूला हो रहा था। शस्त्रके नामपर उसके हाथमें एकमात्र गदा थी। परन्तु परीक्षित्! लोगोंने देखा, वह इतना शक्तिशाली है कि उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी हिल रही है॥ १-२॥