अध्यासीनं च तान् विप्रांश्चुकोपोद्वीक्ष्य माधवः॥ २३
apratyutthāyinaṃ sūtamakṛtaprahvaṇāṃjalim|
adhyāsīnaṃ ca tān viprāṃścukopodvīkṣya mādhavaḥ|| 23
अर्थ
बलरामजीने देखा कि रोमहर्षणजी सूत-जातिमें उत्पन्न होनेपर भी उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऊँचे आसनपर बैठे हुए हैं और उनके आनेपर न तो उठकर स्वागत करते हैं और न हाथ जोड़कर प्रणाम ही। इसपर बलरामजीको क्रोध आ गया॥ २३॥
अप्रत्युत्थायिनं सूतमकृतप्रह्वणांजलिम्।
अध्यासीनं च तान् विप्रांश्चुकोपोद्वीक्ष्य माधवः॥ २३
बलरामजीने देखा कि रोमहर्षणजी सूत-जातिमें उत्पन्न होनेपर भी उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऊँचे आसनपर बैठे हुए हैं और उनके आनेपर न तो उठकर स्वागत करते हैं और न हाथ जोड़कर प्रणाम ही। इसपर बलरामजीको क्रोध आ गया॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.78.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 613) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/78/23/