श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

यद्येतद् ब्रह्महत्यायाः पावनं लोकपावन।

चरिष्यति भवाँल्लोकसङ्ग्रहोऽनन्यचोदितः॥ ३२

yadyetad brahmahatyāyāḥ pāvanaṃ lokapāvana|

cariṣyati bhavām̐llokasaṅgraho'nanyacoditaḥ|| 32

अर्थ

आपने अनजानमें यह ऐसा काम कर दिया, जो ब्रह्महत्याके समान है। हमलोग यह मानते हैं कि आप योगेश्‍वर हैं, वेद भी आपपर शासन नहीं कर सकता। फिर भी आपसे यह प्रार्थना है कि आपका अवतार लोगोंको पवित्र करनेके लिये हुआ है; यदि आप किसीकी प्रेरणाके बिना स्वयं अपनी इच्छासे ही इस ब्रह्महत्याका प्रायश्‍चित्त कर लेंगे तो इससे लोगोंको बहुत शिक्षा मिलेगी’॥ ३१-३२॥

यह अर्थ श्लोक 31–32 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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