॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.78.34
दीर्घमायुर्बतैतस्य सत्त्वमिन्द्रियमेव च।
आशासितं यत्तद् ब्रूत साधये योगमायया॥ ३४
dīrghamāyurbataitasya sattvamindriyameva ca|
āśāsitaṃ yattad brūta sādhaye yogamāyayā|| 34
अर्थ
आपलोग इस सूतको लम्बी आयु, बल, इन्द्रिय-शक्ति आदि जो कुछ भी देना चाहते हों, मुझे बतला दीजिये; मैं अपने योगबलसे सब कुछ सम्पन्न किये देता हूँ॥ ३४॥