उस समय भीमसेन और दुर्योधन दोनों ही हाथमें गदा लेकर एक-दूसरेको जीतनेके लिये क्रोधसे भरकर भाँति-भाँतिके पैंतरे बदल रहे थे। उन्हें देखकर बलरामजीने कहा—॥ २५॥
गदापाणी उभौ दृष्ट्वा संरब्धौ विजयैषिणौ।
मण्डलानि विचित्राणि चरन्ताविदमब्रवीत्॥ २५
उस समय भीमसेन और दुर्योधन दोनों ही हाथमें गदा लेकर एक-दूसरेको जीतनेके लिये क्रोधसे भरकर भाँति-भाँतिके पैंतरे बदल रहे थे। उन्हें देखकर बलरामजीने कहा—॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.79.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 618) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/79/25/