परीक्षित्! भगवान् बलराम स्वयं अनन्त हैं। उनका स्वरूप मन और वाणीके परे है। उन्होंने लीलाके लिये ही यह मनुष्योंका-सा शरीर ग्रहण किया है। उन बलशाली बलरामजीके ऐसे-ऐसे चरित्रोंकी गिनती भी नहीं की जा सकती॥ ३३॥
ईदृग्विधान्यसंख्यानि बलस्य बलशालिनः।
अनन्तस्याप्रमेयस्य मायामर्त्यस्य सन्ति हि॥ ३३
परीक्षित्! भगवान् बलराम स्वयं अनन्त हैं। उनका स्वरूप मन और वाणीके परे है। उन्होंने लीलाके लिये ही यह मनुष्योंका-सा शरीर ग्रहण किया है। उन बलशाली बलरामजीके ऐसे-ऐसे चरित्रोंकी गिनती भी नहीं की जा सकती॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.79.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 619) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/79/33/