यही विचार करके उन्होंने जानेका निश्चय किया और अपनी पत्नीसे बोले—‘कल्याणी! घरमें कुछ भेंट देनेयोग्य वस्तु भी है क्या? यदि हो तो दे दो’॥ १३॥
इति संचिन्त्य मनसा गमनाय मतिं दधे।
अप्यस्त्युपायनं किंचिद् गृहे कल्याणि दीयताम्॥ १३
यही विचार करके उन्होंने जानेका निश्चय किया और अपनी पत्नीसे बोले—‘कल्याणी! घरमें कुछ भेंट देनेयोग्य वस्तु भी है क्या? यदि हो तो दे दो’॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 621) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/13/