ब्रह्मन्! यह जीव विषय-सुखको खोजते-खोजते अत्यन्त दुःखी हो गया है। वे बाणकी तरह इसके चित्तमें चुभते रहते हैं। ऐसी स्थितिमें ऐसा कौन-सा रसिक—रसका विशेषज्ञ पुरुष होगा, जो बार-बार पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णकी मंगलमयी लीलाओंका श्रवण करके भी उनसे विमुख होना चाहेगा॥ २॥
को नु श्रुत्वासकृद् ब्रह्मन्नुत्तमश्लोकसत्कथाः।
विरमेत विशेषज्ञो विषण्णः काममार्गणैः॥ २
ब्रह्मन्! यह जीव विषय-सुखको खोजते-खोजते अत्यन्त दुःखी हो गया है। वे बाणकी तरह इसके चित्तमें चुभते रहते हैं। ऐसी स्थितिमें ऐसा कौन-सा रसिक—रसका विशेषज्ञ पुरुष होगा, जो बार-बार पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णकी मंगलमयी लीलाओंका श्रवण करके भी उनसे विमुख होना चाहेगा॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 619) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/2/