श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

अग्रहीच्छिरसा राजन् भगवाँल्लोकपावनः।

व्यलिम्पद् दिव्यगन्धेन चन्दनागुरुकुंकुमैः॥ २१

agrahīcchirasā rājan bhagavām̐llokapāvanaḥ|

vyalimpad divyagandhena candanāgurukuṃkumaiḥ|| 21

अर्थ

परीक्षित्! कुछ समयके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें ले जाकर अपने पलंगपर बैठा दिया और स्वयं पूजनकी सामग्री लाकर उनकी पूजा की। प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सभीको पवित्र करनेवाले हैं; फिर भी उन्होंने अपने हाथों ब्राह्मणदेवताके पाँव पखारकर उनका चरणोदक अपने सिरपर धारण किया और उनके शरीरमें चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धोंका लेपन किया॥ २०-२१॥

यह अर्थ श्लोक 20–21 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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