ātmā vai prāṇināṃ preṣṭhastamanādṛtya matparāḥ|| 40
अर्थ
वे कहने लगे—‘आश्चर्य है, आश्चर्य है! पुत्रो! तुमलोगोंने हमारे लिये अत्यन्त कष्ट उठाया। सभी प्राणियोंको अपना शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है; परन्तु तुम दोनों उसकी भी परवा न करके हमारी सेवामें ही संलग्न रहे॥ ४०॥
अहो हे पुत्रका यूयमस्मदर्थेऽतिदुःखिताः।
आत्मा वै प्राणिनां प्रेष्ठस्तमनादृत्य मत्पराः॥ ४०
वे कहने लगे—‘आश्चर्य है, आश्चर्य है! पुत्रो! तुमलोगोंने हमारे लिये अत्यन्त कष्ट उठाया। सभी प्राणियोंको अपना शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है; परन्तु तुम दोनों उसकी भी परवा न करके हमारी सेवामें ही संलग्न रहे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 624) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/40/