श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

तुष्टोऽहं भो द्विजश्रेष्ठाः सत्याः सन्तु मनोरथाः।

छन्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च॥ ४२

tuṣṭo'haṃ bho dvijaśreṣṭhāḥ satyāḥ santu manorathāḥ|

chandāṃsyayātayāmāni bhavantviha paratra ca|| 42

अर्थ

द्विज-शिरोमणियो! मैं तुमलोगोंसे अत्यन्त प्रसन्‍न हूँ। तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हों और तुमलोगोंने हमसे जो वेदाध्ययन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कण्ठस्थ रहे तथा इस लोक एवं परलोकमें कहीं भी निष्फल न हो’॥ ४२॥

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