विरक्त इन्द्रियार्थेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः॥ ६
kṛṣṇasyāsīt sakhā kaścid brāhmaṇo brahmavittamaḥ|
virakta indriyārtheṣu praśāntātmā jitendriyaḥ|| 6
अर्थ
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परम मित्र थे। वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयोंसे विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे॥ ६॥
कृष्णस्यासीत् सखा कश्चिद् ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः।
विरक्त इन्द्रियार्थेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः॥ ६
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परम मित्र थे। वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयोंसे विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 620) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/6/