श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

अथैकाशीतितमोऽध्यायः

सुदामाजीको ऐश्‍वर्यकी प्राप्ति

श्रीशुक उवाच

स इत्थं द्विजमुख्येन सह संकथयन् हरिः।

सर्वभूतमनोऽभिज्ञः स्मयमान उवाच तम्॥ १

sa itthaṃ dvijamukhyena saha saṃkathayan hariḥ|

sarvabhūtamano'bhijñaḥ smayamāna uvāca tam|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सबके मनकी बात जानते हैं। वे ब्राह्मणोंके परम भक्त, उनके क्लेशोंके नाशक तथा संतोंके एकमात्र आश्रय हैं। वे पूर्वोक्त प्रकारसे उन ब्राह्मणदेवताके साथ बहुत देरतक बातचीत करते रहे। अब वे अपने प्यारे सखा उन ब्राह्मणसे तनिक मुसकराकर विनोद करते हुए बोले। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण उन ब्राह्मण-देवताकी ओर प्रेमभरी दृष्टिसे देख रहे थे॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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