श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

स चालब्ध्वा धनं कृष्णान्‍न तु याचितवान् स्वयम्।

स्वगृहान् व्रीडितोऽगच्छन्महद्दर्शननिर्वृतः॥ १४

sa cālabdhvā dhanaṃ kṛṣṇānna tu yācitavān svayam|

svagṛhān vrīḍito'gacchanmahaddarśananirvṛtaḥ|| 14

अर्थ

परीक्षित्! श्रीकृष्णसे ब्राह्मणको प्रत्यक्षरूपमें कुछ भी न मिला। फिर भी उन्होंने उनसे कुछ माँगा नहीं! वे अपने चित्तकी करतूतपर कुछ लज्जित-से होकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनजनित आनन्दमें डूबते-उतराते अपने घरकी ओर चल पड़े॥ १३-१४॥

यह अर्थ श्लोक 13–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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