॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.82.29
अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह।
यत् पश्यथासकृत् कृष्णं दुर्दर्शमपि योगिनाम्॥ २९
aho bhojapate yūyaṃ janmabhājo nṛṇāmiha|
yat paśyathāsakṛt kṛṣṇaṃ durdarśamapi yoginām|| 29
अर्थ
उन लोगोंने मुख्यतया उग्रसेनजीको सम्बोधित कर कहा—‘भोजराज उग्रसेनजी! सच पूछिये तो इस जगत्के मनुष्योंमें आपलोगोंका जीवन ही सफल है, धन्य है! धन्य है! क्योंकि जिन श्रीकृष्णका दर्शन बड़े-बड़े योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, उन्हींको आपलोग नित्य-निरन्तर देखते रहते हैं॥ २९॥