श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

वायुर्यथा घनानीकं तृणं तूलं रजांसि च।

संयोज्याक्षिपते भूयस्तथा भूतानि भूतकृत्॥ ४४

vāyuryathā ghanānīkaṃ tṛṇaṃ tūlaṃ rajāṃsi ca|

saṃyojyākṣipate bhūyastathā bhūtāni bhūtakṛt|| 44

अर्थ

जैसे वायु बादलों, तिनकों, रूई और धूलके कणोंको एक-दूसरेसे मिला देती है और फिर स्वच्छन्दरूपसे उन्हें अलग-अलग कर देती है, वैसे ही समस्त पदार्थोंके निर्माता भगवान् भी सबका संयोग-वियोग अपनी इच्छानुसार करते रहते हैं॥ ४४॥

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