श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

लक्ष्मणोवाच

ममापि राज्ञ्यच्युतजन्मकर्म

श्रुत्वा मुहुर्नारदगीतमास ह।✎ 1195

चित्तं मुकुन्दे किल पद्महस्तया

वृतः सुसंमृश्य विहाय लोकपान्॥ १७

mamāpi rājñyacyutajanmakarma

śrutvā muhurnāradagītamāsa ha|

cittaṃ mukunde kila padmahastayā

vṛtaḥ susaṃmṛśya vihāya lokapān|| 17

अर्थ

लक्ष्मणाने कहा—रानीजी! देवर्षि नारद बार-बार भगवान्‌के अवतार और लीलाओंका गान करते रहते थे। उसे सुनकर और यह सोचकर कि लक्ष्मीजीने समस्त लोकपालोंका त्याग करके भगवान्‌का ही वरण किया, मेरा चित्त भगवान्‌के चरणोंमें आसक्त हो गया॥ १७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1195 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): च →

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