श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

पित्रा सम्पूजिताः सर्वे यथावीर्यं यथावयः।

आददुः सशरं चापं वेद्धुं पर्षदि मद्धियः॥ २१

pitrā sampūjitāḥ sarve yathāvīryaṃ yathāvayaḥ|

ādaduḥ saśaraṃ cāpaṃ veddhuṃ parṣadi maddhiyaḥ|| 21

अर्थ

मेरे पिताजीने आये हुए सभी राजाओंका बल-पौरुष और अवस्थाके अनुसार भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। उन लोगोंने मुझे प्राप्त करनेकी इच्छासे स्वयंवरसभामें रखे हुए धनुष और बाण उठाये॥ २१॥✎ 1716

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1716 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वयंवर-सभामें → स्वयंवरसभामें

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