मेरे पिताजीने आये हुए सभी राजाओंका बल-पौरुष और अवस्थाके अनुसार भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। उन लोगोंने मुझे प्राप्त करनेकी इच्छासे स्वयंवरसभामें रखे हुए धनुष और बाण उठाये॥ २१॥✎ 1716
पित्रा सम्पूजिताः सर्वे यथावीर्यं यथावयः।
आददुः सशरं चापं वेद्धुं पर्षदि मद्धियः॥ २१
मेरे पिताजीने आये हुए सभी राजाओंका बल-पौरुष और अवस्थाके अनुसार भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। उन लोगोंने मुझे प्राप्त करनेकी इच्छासे स्वयंवरसभामें रखे हुए धनुष और बाण उठाये॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 640) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)