श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

मत्स्याभासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा च तदवस्थितिम्।

पार्थो यत्तोऽसृजद् बाणं नाच्छिनत् पस्पृशे परम्॥ २४

matsyābhāsaṃ jale vīkṣya jñātvā ca tadavasthitim|

pārtho yatto'sṛjad bāṇaṃ nācchinat paspṛśe param|| 24

अर्थ

पाण्डववीर अर्जुनने जलमें उस मछलीकी परछाईं देख ली और यह भी जान लिया कि वह कहाँ है। बड़ी सावधानीसे उन्होंने बाण छोड़ा भी; परन्तु उससे लक्ष्यवेध न हुआ, उनके बाणने केवल उसका स्पर्शमात्र किया॥ २४॥✎ 1716

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1716 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वयंवर-सभामें → स्वयंवरसभामें

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