॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.83.28
तद् रंगमाविशमहं कलनूपुराभ्यां
पद्भ्यां प्रगृह्य कनकोज्ज्वलरत्नमालाम्।
नूत्ने निवीय परिधाय च कौशिकाग्र्ये ✎ 2134
सव्रीडहासवदना कबरीधृतस्रक्॥ २८
tad raṃgamāviśamahaṃ kalanūpurābhyāṃ
padbhyāṃ pragṛhya kanakojjvalaratnamālām|
nūtne nivīya paridhāya ca kauśikāgrye
savrīḍahāsavadanā kabarīdhṛtasrak|| 28
अर्थ
रानीजी! उसी समय मैंने रंगशालामें प्रवेश किया। मेरे पैरोंके पायजेब रुनझुन-रुनझुन बोल रहे थे। मैंने नये-नये उत्तम रेशमी वस्त्र धारण कर रखे थे। मेरी चोटियोंमें मालाएँ गुँथी हुई थीं और मुँहपर लज्जामिश्रित मुसकराहट थी। मैं अपने हाथोंमें रत्नोंका हार लिये हुए थी, जो बीच-बीचमें लगे हुए सोनेके कारण और भी दमक रहा था। रानीजी! उस समय मेरा मुखमण्डल घनी घुँघराली अलकोंसे सुशोभित हो रहा था तथा कपोलोंपर कुण्डलोंकी आभा पड़नेसे वह और भी दमक उठा था। मैंने एक बार अपना मुख उठाकर चन्द्रमाकी किरणोंके समान सुशीतल हास्यरेखा और तिरछी चितवनसे चारों ओर बैठे हुए राजाओंकी ओर देखा, फिर धीरेसे अपनी वरमाला भगवान्के गलेमें डाल दी। यह तो कह ही चुकी हूँ कि मेरा हृदय पहलेसे ही भगवान्के प्रति अनुरक्त था॥ २८-२९॥