उन्होंने बहुत देरतक विचार करनेके बाद यह निश्चय किया कि भगवान् सर्वेश्वर होनेपर भी जो इस प्रकार सामान्य, कर्म-परतन्त्र जीवकी भाँति व्यवहार कर रहे हैं—यह केवल लोकसंग्रहके लिये ही है। ऐसा समझकर वे मुसकराते हुए जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णसे कहने लगे॥ १५॥
चिरं विमृश्य मुनय ईश्वरस्येशितव्यताम्।
जनसङ्ग्रह इत्यूचुः स्मयन्तस्तं जगद्गुरुम्॥ १५
उन्होंने बहुत देरतक विचार करनेके बाद यह निश्चय किया कि भगवान् सर्वेश्वर होनेपर भी जो इस प्रकार सामान्य, कर्म-परतन्त्र जीवकी भाँति व्यवहार कर रहे हैं—यह केवल लोकसंग्रहके लिये ही है। ऐसा समझकर वे मुसकराते हुए जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णसे कहने लगे॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 645) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/15/