श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

चिरं विमृश्य मुनय ईश्‍वरस्येशितव्यताम्।

जनसङ्ग्रह इत्यूचुः स्मयन्तस्तं जगद्गुरुम्॥ १५

ciraṃ vimṛśya munaya īśvarasyeśitavyatām|

janasaṅgraha ityūcuḥ smayantastaṃ jagadgurum|| 15

अर्थ

उन्होंने बहुत देरतक विचार करनेके बाद यह निश्‍चय किया कि भगवान् सर्वेश्‍वर होनेपर भी जो इस प्रकार सामान्य, कर्म-परतन्त्र जीवकी भाँति व्यवहार कर रहे हैं—यह केवल लोकसंग्रहके लिये ही है। ऐसा समझकर वे मुसकराते हुए जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णसे कहने लगे॥ १५॥

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