sabhājayasi saddhāma tad brahmaṇyāgraṇīrbhavān|| 20
अर्थ
परमात्मन्! ब्राह्मण ही वेदोंके आधारभूत आपके स्वरूपकी उपलब्धिके स्थान हैं; इसीसे आप ब्राह्मणोंका सम्मान करते हैं और इसीसे आप ब्राह्मणभक्तोंमें अग्रगण्य भी हैं॥ २०॥
तस्माद् ब्रह्मकुलं ब्रह्मन् शास्त्रयोनेस्त्वमात्मनः।
सभाजयसि सद्धाम तद् ब्रह्मण्याग्रणीर्भवान्॥ २०
परमात्मन्! ब्राह्मण ही वेदोंके आधारभूत आपके स्वरूपकी उपलब्धिके स्थान हैं; इसीसे आप ब्राह्मणोंका सम्मान करते हैं और इसीसे आप ब्राह्मणभक्तोंमें अग्रगण्य भी हैं॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 646) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/20/