॥ श्रीहरिः ॥
चित्तस्योपशमोऽयं वै कविभिः शास्त्रचक्षुषा।
दर्शितः सुगमो योगो धर्मश्चात्ममुदावहः॥ ३६
cittasyopaśamo'yaṃ vai kavibhiḥ śāstracakṣuṣā|
darśitaḥ sugamo yogo dharmaścātmamudāvahaḥ|| 36
अर्थ
त्रिकालदर्शी ज्ञानियोंने शास्त्रदृष्टिसे यही चित्तकी शान्तिका उपाय, सुगम मोक्षसाधन और चित्तमें आनन्दका उल्लास करनेवाला धर्म बतलाया है॥ ३६॥
चित्तस्योपशमोऽयं वै कविभिः शास्त्रचक्षुषा।
दर्शितः सुगमो योगो धर्मश्चात्ममुदावहः॥ ३६
त्रिकालदर्शी ज्ञानियोंने शास्त्रदृष्टिसे यही चित्तकी शान्तिका उपाय, सुगम मोक्षसाधन और चित्तमें आनन्दका उल्लास करनेवाला धर्म बतलाया है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 648) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/36/