श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

नेदुर्मृदंगपटहशंखभेर्यानकादयः ।

ननृतुर्नटनर्तक्यस्तुष्टुवुः सूतमागधाः।

जगुः सुकण्ठ्यो गन्धर्व्यः संगीतं सहभर्तृकाः॥ ४६

nedurmṛdaṃgapaṭahaśaṃkhabheryānakādayaḥ |

nanṛturnaṭanartakyastuṣṭuvuḥ sūtamāgadhāḥ|

jaguḥ sukaṇṭhyo gandharvyaḥ saṃgītaṃ sahabhartṛkāḥ|| 46

अर्थ

उस समय मृदंग, पखावज, शंख, ढोल और नगारे आदि बाजे बजने लगे। नट और नर्तकियाँ नाचने लगीं। सूत और मागध स्तुतिगान करने लगे। गन्धर्वोंके साथ सुरीले गलेवाली गन्धर्वपत्‍नियाँ गान करने लगीं॥ ४६॥

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