श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.54

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

स्नातोऽलंकारवासांसि वन्दिभ्योऽदात्तथा स्त्रियः।

ततः स्वलंकृतो वर्णानाश्‍वभ्योऽन्‍नेन पूजयत्॥ ५४

snāto'laṃkāravāsāṃsi vandibhyo'dāttathā striyaḥ|

tataḥ svalaṃkṛto varṇānāśvabhyo'nnena pūjayat|| 54

अर्थ

स्नान करनेके बाद वसुदेवजी और उनकी पत्‍नियोंने वंदी-जनोंको अपने सारे वस्त्राभूषण दे दिये तथा स्वयं नये वस्त्राभूषणसे सुसज्जित होकर उन्होंने ब्राह्मणोंसे लेकर कुत्तोंतकको भोजन कराया॥ ५४॥✎ 1441 1442

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1441 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमें—रामहृदमें → हृदमें—रामह्रदमें
  • #1442 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमें—रामह्रदमें → ह्रदमें—रामह्रदमें

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें