श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.61

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

वसुदेव उवाच

भ्रातरीशकृतः पाशो नृणां यः स्नेहसंज्ञितः।✎ 1201

तं दुस्त्यजमहं मन्ये शूराणामपि योगिनाम्॥ ६१

bhrātarīśakṛtaḥ pāśo nṛṇāṃ yaḥ snehasaṃjñitaḥ|

taṃ dustyajamahaṃ manye śūrāṇāmapi yoginām|| 61

अर्थ

वसुदेवजीने कहा—भाईजी! भगवान्‌ने मनुष्योंके लिये एक बहुत बड़ा बन्धन बना दिया है। उस बन्धनका नाम है स्नेह, प्रेमपाश। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि बड़े-बड़े शूरवीर और योगी-यति भी उसे तोड़नेमें असमर्थ हैं॥ ६१॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1201 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

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