श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अहो वयं जन्मभृतो लब्धं कार्त्स्न्येन तत्फलम्।

देवानामपि दुष्प्रापं यद् योगेश्‍वरदर्शनम्॥ ९

aho vayaṃ janmabhṛto labdhaṃ kārtsnyena tatphalam|

devānāmapi duṣprāpaṃ yad yogeśvaradarśanam|| 9

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—धन्य है! हमलोगोंका जीवन सफल हो गया, आज जन्म लेनेका हमें पूरा-पूरा फल मिल गया; क्योंकि जिन योगेश्‍वरोंका दर्शन बड़े-बड़े देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है, उन्हींका दर्शन हमें प्राप्त हुआ है॥ ९॥ जिन्होंने बहुत थोड़ी तपस्या की है और जो लोग अपने इष्टदेवको समस्त प्राणियोंके हृदयमें न देखकर केवल मूर्तिविशेषमें ही उनका दर्शन करते हैं, उन्हें आपलोगोंके दर्शन, स्पर्श, कुशल-प्रश्‍न, प्रणाम और पादपूजन आदिका सुअवसर भला कब मिल सकता है?॥ १०॥

यह व्याख्या श्लोक 10.84.9 से 10.84.10 तककी एक साथ है।

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