श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

असावहं ममैवैते देहे चास्यान्वयादिषु।

स्नेहपाशैर्निबध्नाति भवान् सर्वमिदं जगत्॥ १७

asāvahaṃ mamaivaite dehe cāsyānvayādiṣu|

snehapāśairnibadhnāti bhavān sarvamidaṃ jagat|| 17

अर्थ

प्रभो! यह शरीर मैं हूँ और इस शरीरके सम्बन्धी मेरे अपने हैं, इस अहंता एवं ममतारूप स्नेहकी फाँसीसे तुमने इस सारे जगत‍्को बाँध रखा है॥ १७॥

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